Saturday, 10 July 2010

जब मैं छोटा बच्चा था

जब मैं मां की गोद को
जहां अपना समझता था
वक्त वह बड़ा ही अच्छा था
जब मैं छोटा बच्चा था।

50 पैसे का सिक्का पाने को
कविता शौक से सुनाता
धूल के बीच सुबह से शाम तक
गुल्ली-डंडा खेला करता था।

गोलियां-टाफियां खाता था
छोटी निक्कर पहनता
दोस्तों-यारों की जुंडली में
नरेंद्र-संजू के साथ खो जाता।

न कुड़ियों का कोई जिक्र
न पढ़ाई का फिक्र
न फेस-बुक पर कोई स्टेटस
पत्थर मार अंबियां गिराता।

जब दोस्त सारे मेरे थे साथ
मिनटों की तरह गुजरते साल
स्कूल की सीढ़ी चढ़ आए कालेज में
जिदंगी सफल बनाने की ललक में।

अब दुनियादारी निभानी पड़ती है
सॉरी-थैंक्यू कहना पड़ता है
फिर भी यार मेरे पूछते हैं
अकेला-अकेला क्यों रहता है?

मैं जवाब नहीं दे पाता हूं
बस चुप्पी में खो जाता हूं
फिर आंसू पोंछकर कहता हूं
तुम चलो मैं आता हूं।

सब पूछते हैं वजह पत्थर दिल की
मैंने कहा-याद आ गई गुजरे वक्त की
भाई-बहन, मम्मी-डैडी के प्यार की
दोस्तों-यारों और हैप्पी-हैप्पी पलों की।

जब दिल पर बोझ बढ़ जाता है
सब बिगड़ा-बिगड़ा लगता है
तब एक ही बात मैं करता हूं
वक्त वह बड़ा ही अच्छा था
जब मैं निक्का बच्चा था।

8 comments:

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

सुंदर कविता

Unknown said...

Bahut hi sunder

Takdhinaadhin said...

Great

Thakur negi said...

बहुत सुंदर

Thakur negi said...

बहुत सुंदर

Thakur negi said...

बहुत सुंदर

एन. राम said...

Tnx all

Anonymous said...

बचपन मे खेल और जवानी में कुछ नहीं अच्छा था जब समझ आया तो बचपन ही अच्छा था . ✍️Beimaan shayar