Sunday, 26 September 2010

दिल मजबूर

तू चले जिस राह, बनके फूल बिछ जाऊं मैं
तुम्हारी खुशी के लिए, हलाल हो जाऊं मैं
जाती नहीं दिल केगलियारों से खुशबू तुम्हारी
बेरहम दिल के हाथों मजबूर सा हो जाता हूं मैं।

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खून का कतरा-कतरा कहता है
दूर हैं तो क्या हूआ, रिश्ता गहरा है
ठुकराने से तुम्हारे फर्क नहीं पड़ता
दिल तो अभी भी रोता तेरे लिए है।

Wednesday, 22 September 2010

गुजरा हुआ कल

भारी पलकों के साथ
था मैं एक रात
निंदिया रानी की गोद में
तभी चली यादों की आंधी
हुई पत्तों की सरसराहट
नीचे नजर गई तो
एक पत्ता अपना सा लगा।

कोमल से पत्ते को उठाया तो
जैसे प्यार का झोंका आया
मैंने पत्ते से पूछा-
कौन हो भाई?
बोला-मैं ही तो हूं तुम्हारा
गुजरा हुआ कल
भूल गए मैंने हमेशा साथ दिया
संग चहके, हंसी-ठिठोली की
मिलकर मनाई होली-दिवाली
यूं ही चल रहा था खुशियों का रेला
नहीं था कोई झमेला...

...पर आंधी तो आंधी है न
ले उड़ी मुझे बहुत दूर
पर अब हम मिल गए हैं न
फिर वही जमाना आया...

अचानक तंद्रा टूटी
मैंने पत्ते को खोजने के लिए हाथ मारे
पर वह नहीं मिला
तब समझा उफ! ये तो सपना था
मैं फिर लेट गया हूं
किसी आंधी के इंतजार में
शायद फिर वह पत्ता मिल जाए
सपने में ही सही...

Tuesday, 21 September 2010

तुम देना साथ मेरा

सुबह और हर शाम में
हर तिथि-त्योहार में
सूखे पत्तों की सरसराहट
और बरसात-बहार में
तुम देना साथ मेरा।

जलती दोपहरी में
जिंदगी काली सुनहरी में
जब हो सबसे ज्यादा जरूरत
मरहम की इस दिल में
तुम देना साथ मेरा।

जीवन के हर रंग में
रंग में प़ गए �ंग में
चलती हो जिंदगी जब
धक्का स्टार्ट में
तुम देना साथ मेरा
ऐ हमनवा...