Wednesday, 22 September 2010

गुजरा हुआ कल

भारी पलकों के साथ
था मैं एक रात
निंदिया रानी की गोद में
तभी चली यादों की आंधी
हुई पत्तों की सरसराहट
नीचे नजर गई तो
एक पत्ता अपना सा लगा।

कोमल से पत्ते को उठाया तो
जैसे प्यार का झोंका आया
मैंने पत्ते से पूछा-
कौन हो भाई?
बोला-मैं ही तो हूं तुम्हारा
गुजरा हुआ कल
भूल गए मैंने हमेशा साथ दिया
संग चहके, हंसी-ठिठोली की
मिलकर मनाई होली-दिवाली
यूं ही चल रहा था खुशियों का रेला
नहीं था कोई झमेला...

...पर आंधी तो आंधी है न
ले उड़ी मुझे बहुत दूर
पर अब हम मिल गए हैं न
फिर वही जमाना आया...

अचानक तंद्रा टूटी
मैंने पत्ते को खोजने के लिए हाथ मारे
पर वह नहीं मिला
तब समझा उफ! ये तो सपना था
मैं फिर लेट गया हूं
किसी आंधी के इंतजार में
शायद फिर वह पत्ता मिल जाए
सपने में ही सही...

3 comments:

निर्मला कपिला said...

भावमयी रचना। बहुत अच्छी लगी।शुभकामनायें

अजित गुप्ता का कोना said...

अच्‍छी कविता है, बधाई।

Anonymous said...

nice....