छुट्टी का दिन था। इच्छा हुई आज जमकर राजधानी की सैर करूंगा। माल रोड पर पहुंचा तो लगा आज सूर्य देव कुछ ज्यादा ही प्रचंड हैं।
मैं सोचने लगा कि अगर शिमला में मुझे गर्मी इतनी अधिक लग रही है तो उन लोगों का क्या हाल होगा जो पंजाब, दिल्ली और राजस्थान जैसे राज्यों में हैं। हालांकि मैं भी १० साल पंजाब में गुजार कर आया हूं लेकिन लगता है अगर अब दोबारा जाऊंगा तो गर्मी और प्रदूषण भरे माहौल में एडजस्ट करने में समय लग जाएगा।
कालीबाड़ी के रास्ते में कुछ भिखारियों को बैठे देखा तो सोचने लगा कि जो लोग विदेश या अन्य राज्यों से शिमला की सैर पर आते होंगे वे क्या छवि बनाकर लौटते होंगे। अगर ये लोग वाकई जरूरतमंद हैं तो क्या हमारी सरकार का इनके प्रति कत्र्तव्य नहीं है। मंत्री लाखों रुपए अपने दौरों पर खर्च कर डालते हैं, क्या कुछ लाख रुपए खर्च कर इन लोगों के लिए आश्रम नहीं बनाया जा सकता। हालांकि पंजाब में कई स्थानों पर ऐसे लोगों के लिए आश्रय स्थल बने हुए हैं। ऐसे स्थानों पर आम जनता भी इनके खाने-पीने और कपड़ों के लिए सहायता करने के लिए आगे आती रहती है। इतना सोच ही रहा था कि भिखारिन के थोड़ी दूर खड़ी उसकी ६-७ साल की बच्ची की चीख ने मेरा ध्यान खींच लिया। उसके हाथ में एक थाली थी जिसमें देवताओं की तस्वीर थी। उस थाली में कुछ खाने की चीजें थी जिन्हे छीनने के लिए एक बंदर उससे जद्दोजहद कर रहा था। हालांकि शिमला के बंदर कम चालाक नहीं हैं। ये तो ब्लैकमेल भी करना जानते हैं...। इसकी बात कभी बाद में
माता के मंदिर में माथा टेककर इच्छा हुई लोअर बाजार का चक्कर लगाया जाए। डीसी आफिस होते हुए मैं सब्जी मंडी के पास पहुंचा। इस दौरान हल्की-फुल्की खरीदारी भी की। धूप काफी तेज थी। मैं आराम करने के लिए छाया में सीढिय़ों पर बैठ गया। थोड़ी दूर ही एक बुजुर्ग बैठे सुस्ता रहे थे। इतने में पौडिय़ों पर ही फड़ी लगाए एक दुकानदार ने उस शख्स को झिड़कते हुए कहा-भाजी इत्थे न सोवो। जे सौणा है तां किते होर चले जाओ, मेरे कोल पैहलां ही कोई कम्म (बिक्री) नहीं है।
मुझे यहां भी झटका लगा। एक तो उस जगह फड़ी लगा रखी है जो आम आदमी का हक बनता है। दूसरे वहां पर बैठने वाले लोगों से भी इन लोगों को तकलीफ होती है। अगर उनकी बिक्री न हुई तो क्या उस आदमी का कसूर है जो उसके नजदीक बैठा है?
मैं सोचने लगा कि अगर शिमला में मुझे गर्मी इतनी अधिक लग रही है तो उन लोगों का क्या हाल होगा जो पंजाब, दिल्ली और राजस्थान जैसे राज्यों में हैं। हालांकि मैं भी १० साल पंजाब में गुजार कर आया हूं लेकिन लगता है अगर अब दोबारा जाऊंगा तो गर्मी और प्रदूषण भरे माहौल में एडजस्ट करने में समय लग जाएगा।
कालीबाड़ी के रास्ते में कुछ भिखारियों को बैठे देखा तो सोचने लगा कि जो लोग विदेश या अन्य राज्यों से शिमला की सैर पर आते होंगे वे क्या छवि बनाकर लौटते होंगे। अगर ये लोग वाकई जरूरतमंद हैं तो क्या हमारी सरकार का इनके प्रति कत्र्तव्य नहीं है। मंत्री लाखों रुपए अपने दौरों पर खर्च कर डालते हैं, क्या कुछ लाख रुपए खर्च कर इन लोगों के लिए आश्रम नहीं बनाया जा सकता। हालांकि पंजाब में कई स्थानों पर ऐसे लोगों के लिए आश्रय स्थल बने हुए हैं। ऐसे स्थानों पर आम जनता भी इनके खाने-पीने और कपड़ों के लिए सहायता करने के लिए आगे आती रहती है। इतना सोच ही रहा था कि भिखारिन के थोड़ी दूर खड़ी उसकी ६-७ साल की बच्ची की चीख ने मेरा ध्यान खींच लिया। उसके हाथ में एक थाली थी जिसमें देवताओं की तस्वीर थी। उस थाली में कुछ खाने की चीजें थी जिन्हे छीनने के लिए एक बंदर उससे जद्दोजहद कर रहा था। हालांकि शिमला के बंदर कम चालाक नहीं हैं। ये तो ब्लैकमेल भी करना जानते हैं...। इसकी बात कभी बाद में
माता के मंदिर में माथा टेककर इच्छा हुई लोअर बाजार का चक्कर लगाया जाए। डीसी आफिस होते हुए मैं सब्जी मंडी के पास पहुंचा। इस दौरान हल्की-फुल्की खरीदारी भी की। धूप काफी तेज थी। मैं आराम करने के लिए छाया में सीढिय़ों पर बैठ गया। थोड़ी दूर ही एक बुजुर्ग बैठे सुस्ता रहे थे। इतने में पौडिय़ों पर ही फड़ी लगाए एक दुकानदार ने उस शख्स को झिड़कते हुए कहा-भाजी इत्थे न सोवो। जे सौणा है तां किते होर चले जाओ, मेरे कोल पैहलां ही कोई कम्म (बिक्री) नहीं है।
मुझे यहां भी झटका लगा। एक तो उस जगह फड़ी लगा रखी है जो आम आदमी का हक बनता है। दूसरे वहां पर बैठने वाले लोगों से भी इन लोगों को तकलीफ होती है। अगर उनकी बिक्री न हुई तो क्या उस आदमी का कसूर है जो उसके नजदीक बैठा है?
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