बरसों पहले निकला था
चिराग हाथ में लेकर
सफेद चादर से उजले
मन-मश्तिष्क के साथ
ढूँढने जिन्दगी का उजाला
बाकी था अभी
बचपन का अल्हड़पन
जिन्दगी के कठिन रास्तों पर
चलने के अनजानापन
फिर भी चल पड़ा मैं
तलाशने जीवन की कार्यशाला
जीवन की बस्ती में
रोज़ बनती- मिटती हस्ती में
नंगे पांव कंटीले पथ पर
भँवरे सी मस्ती के साथ
चखने को लालायित
जीवन की कीमत पर
मधु का स्वाद
कर पाऊं कोई बड़ा कमाल
हो जाऊं न हलाल
साजिशों की नगरी में
साथ रखूँ कौन सी ढाल
इस विचार से अनजान
चल निकला लेकर
ऊपर वाले का नाम.

1 comment:
अच्छा है! कभी हमारी गली में भी हज़ारी लगायें?
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